Guest Writer - Jagran

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Hardiyanarayan Dixit


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राजनीति में क्षेत्रीयता

Posted On: 8 Jan, 2010  
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Hello world!

Posted On: 8 Jan, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रणाम सर , आपके आर्टिकल मै हमेशा पढता हु अखबारों में ,और आप जो भी मुद्दे उठाते है वो बहुत महत्वपूर्ण होते है ,आरक्षण से जो सबसे खतरनाक बात ये हो रही है की एक तरफ युवा वर्ग में प्रतिस्पर्धा की भावना ख़त्म होती जा रही है दूसरी ओर राजनीतिक दलों के प्राइवेट लिमिटेड बनते जाने से राजनीती और लोकतंत्र जैसे शब्द कोई एहसास नहीं जगाते क्योकि ये दल वही मध्यकालीन सामंतवादी विचारधारा पे चल रहे है, और इसका परिणाम राज ठाकरे ,राबड़ी देवी के रूप में देखने को मिलेंगे .........जाहिर है भाजपा ही वास्तव में एक किरण थी पर वो खुद में इतनी उलझी और इस गैरजिमेदारी का परिचय दिया मानो उसे इस बात की परवाह ही नहीं की देश के करोडो लोग जो भाजपा को अलग मानते है उन्हें कितनी ठेस पहुचेगी, खैर हम विश्वास करते है की भाजपा जल्द ही अपने रूप को प्राप्त कर ले .....

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